ईसाई धर्म के अनुसार, बाइबल में वर्णित चार सुसमाचारों (मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना) में कहा गया है कि यीशु मसीह को सूली पर चढ़ाया गया, वे मर गए, और तीसरे दिन मृतकों में से जीवित हो गए। इसे "पुनरुत्थान" कहा जाता है और यह ईसाई धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है।
सुसमाचारों के अनुसार, यीशु को रोमन सैनिकों ने क्रूस पर चढ़ाया, उनकी मृत्यु हुई, और उन्हें एक कब्र में रखा गया। तीसरे दिन, उनके शिष्यों और कुछ महिलाओं ने देखा कि कब्र खाली थी, और बाद में यीशु जीवित रूप में उनके सामने प्रकट हुए। बाइबल में लिखा है कि वे 40 दिनों तक लोगों के बीच रहे, फिर स्वर्ग में चढ़ गए। ईसाइयों का मानना है कि यह घटना पापों से मुक्ति और अनंत जीवन का प्रमाण है।
हालांकि, इस घटना को लेकर ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सवाल उठते हैं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यीशु एक वास्तविक व्यक्ति थे, जिन्हें सूली पर चढ़ाया गया था, क्योंकि रोमन और यहूदी स्रोतों (जैसे जोसेफस और टैसिटस) में इसका उल्लेख मिलता है। लेकिन पुनरुत्थान को साबित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष पुरातात्विक या ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, क्योंकि यह एक चमत्कार माना जाता है जो सामान्य प्राकृतिक नियमों से परे है।
कुछ संशयवादी और गैर-ईसाई विद्वान इसे एक मिथक या प्रतीकात्मक कहानी मानते हैं। उनका कहना है कि यह यीशु के अनुयायियों द्वारा उनकी शिक्षाओं को जीवित रखने के लिए बनाई गई कथा हो सकती है। दूसरी ओर, ईसाई विश्वासी इसे शाब्दिक सत्य मानते हैं और कहते हैं कि इसके गवाहों (शिष्यों और अन्य लोगों) के अनुभव इसकी सत्यता का प्रमाण हैं।
अंत में, यह विश्वास का मामला है। अगर आप ईसाई धर्म के दृष्टिकोण से देखें, तो हां, यीशु सचमुच मर कर जीवित हुए थे। लेकिन अगर आप इसे वैज्ञानिक या ऐतिहासिक नजरिए से देखते हैं, तो इस पर बहस जारी है, क्योंकि चमत्कार को प्रमाणित करना मुश्किल है। आप इसे किस रूप में स्वीकार करते हैं, यह आपकी व्यक्तिगत मान्यता पर निर्भर करता है।

