इब्रानियों 6:7 क्योंकि जो भूमि वर्षा के पानी को जो उस पर बार बार पड़ता है, पी पीकर जिन लोगों के लिये वह जोती-बोई जाती है, उन के काम का साग-पात उपजाती है, वह परमेश्वर से आशीष पाती है। 8पर यदि वह झाड़ी और ऊंटकटारे उगाती है, तो निकम्मी और स्रापित होने पर है, और उसका अन्त जलाया जाना है॥
एक गहन उपमा प्रस्तुत करता है, जो हमें धार्मिक और आध्यात्मिक अर्थ में समझाता है कि जैसे कि वृष्टि के पानी भूमि पर गिरता है और उस पर बार-बार पड़ता है, वैसे ही भगवान के वचन की सीख को भी हमें बार-बार ध्यान में रखना चाहिए।
यहां पर प्रकृति की उपमा का उपयोग किया गया है ताकि हमें धार्मिक और आध्यात्मिक अर्थ में सीख समझाने में मदद मिल सके। इस उपमा के माध्यम से, हमें यह समझाया जाता है कि जैसे कि वृष्टि के पानी एक पौधे को पोषण प्रदान करता है और उसका विकास करता है, वैसे ही परमेश्वर के वचन भी हमें धार्मिक और आध्यात्मिक प्रगति में सहायक होते हैं।
पहले श्लोक में कहा गया है कि जो भूमि वर्षा के पानी को जो उस पर बार-बार पड़ता है, पी पीकर जिन लोगों के लिए वह जोती-बोई जाती है, उनके काम का साग-पात उपजाती है, और वह परमेश्वर से आशीष पाती है। यहां, परमेश्वर के वचन को वृष्टि के पानी के समान देखा गया है जो हमारे जीवन को पोषित करता है और हमें विकसित करता है। जिस पौधे को वृष्टि के पानी की आवश्यकता होती है, वह उस पानी को पीकर अपने विकास के लिए उसका उपयोग करता है। इसी तरह, जो लोग परमेश्वर के वचनों का प्रयोग करते हैं, वे धार्मिक और आध्यात्मिक विकास के लिए उनका उपयोग करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
दूसरे श्लोक में कहा गया है कि अगर वह झाड़ी और ऊंटकटारे उगाती है, तो निकम्मी और स्रापित होने पर है, और उसका अन्त जलाया जाना है। यहां, उस भूमि की उपमा की गई है जिसमें पानी की अधिकता न होने के कारण पौधे नहीं उग सकते हैं, और उन्हें विनाश का सामना करना पड़ता है। इसका अर्थ है कि जो लोग परमेश्वर के वचनों का अनादर करते हैं और उनका पालन नहीं करते हैं, वे धार्मिक और आध्यात्मिक विकास में सफल नहीं होते हैं और उन्हें उनके अप्रिय और निरर्थक कार्यों का फल भुगतना पड़ता है।
निष्फलता का उदाहरण: एक और किसान जो अपने खेतों की देखभाल नहीं करता, या वृष्टि के समय पर उन्हें पानी नहीं पहुंचता, उसके खेतों में सफलता नहीं होती है। उसके फसलें सूख जाती हैं और वह उचित फल नहीं देती। इसी तरह, जो व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को अनदेखा करता है और उनका पालन नहीं करता, वह अपने आत्मिक और आध्यात्मिक विकास में सफल नहीं होता है और उसका जीवन निष्फल होता है।
समृद्धि का उदाहरण: एक शिक्षक जो अपने विद्यार्थियों को ध्यान में रखता है, उन्हें समझाने का प्रयास करता है और उनकी समृद्धि के लिए प्रोत्साहित करता है, वह उन्हें अच्छे अंक प्राप्त करने में मदद करता है। उसके प्रयास का परिणामस्वरूप, उनके विद्यार्थी सफलता की ऊँचाइयों को प्राप्त करते हैं। इसी तरह, जो व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को ध्यान में रखता है और उनका पालन करता है, वह अपने आत्मिक और आध्यात्मिक विकास में सफल होता है और परमेश्वर के आशीर्वाद का भागी होता है।
इब्रानियों 6:7-8 में खेती के अनुप्रयोग से आध्यात्मिक सत्यों को समझाने का प्रयास किया गया है। यहाँ एक और संदर्भ दिया जा रहा है जिससे इस उपदेश का और भी स्पष्ट अर्थ समझा जा सकता है:
सोचिए, एक किसान जो नियमित रूप से अपने खेतों की देखभाल करता है, वह सुनिश्चित करता है कि उन्हें आवश्यक पानी और देखभाल मिलती रहती है। वह धरती की उर्वरता का महत्व समझता है और बीजों को समय पर बोता है। इस प्रकार, जब वर्षा होती है, तो बीज अच्छे से उगते हैं और स्वस्थ फसल के रूप में परिणत होते हैं, जो एक सुखद फसल की उत्पत्ति करते हैं। उसी तरह, जो लोग भगवान के वचनों का ध्यानपूर्वक सुनते हैं और उनका पालन करते हैं, वे उन आत्मिक अन्नों को स्वीकार करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में सफलता की समृद्धि प्राप्त करते हैं।
उसके विपरीत, एक और स्थिति का विचार करें जहां एक किसान अपने खेतों का ध्यान नहीं रखता, उन्हें उपयुक्त देखभाल और ध्यान नहीं देता। वह बोने के समय को नजरअंदाज करता है और सिंचाई की जरूरत को नजरअंदाज करता है, जिसके परिणामस्वरूप वह खुराक धारण नहीं करते बीजों की अनुप्राणित भूमि के रूप में होता है, जिससे कि कोई अर्थपूर्ण उत्पादन नहीं होता। उसी तरह, जो व्यक्ति भगवान के वचनों का अनदेखा करता है और उनका पालन नहीं करता, वह आत्मिक और आध्यात्मिक जीवन में सफल नहीं होता है, और उसका जीवन निष्फल हो जाता है।
इस तरह, इस उपमा के माध्यम से, हमें यह समझाया जाता है कि धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन में सफलता के लिए हमें परमेश्वर के वचनों के पालन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जैसे कि भूमि को उर्वर बनाने के लिए समय, ध्यान, और प्रयत्न की आवश्यकता होती है, वैसे ही हमें भगवान के वचनों को हमारे जीवन में उतारने के लिए समर्पित रहना चाहिए। इससे हम आत्मिक विकास के मार्ग पर अग्रसर होते हैं और परमेश्वर के आशीर्वाद को प्राप्त कर सकते हैं ।
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What does Hebrews 6:7 mean?

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